Prachin Kriya Yog Sansthan

क्रिया ग्रन्थ 1 Mool Kriya

मूल क्रिया

क्रिया ही उपनिषद् है एवं उपनिषद् ही क्रिया है। मूल क्रिया की गणना योगभक्तिपरक विज्ञान के पारिभाषिक विषयों में की जाती रही है। सत्यपथगामी साधक इस गुह्य पदार्थ विज्ञान की अन्तर्निहित जटिलताओं के फलस्वरूप प्रायः दिग्भ्रमित हो जाते हैं।

प्राचीन क्रिया योग संस्थान (कूटस्थिते दिव्यचक्षुदर्शितेन् संचालितः दिव्यः उपक्रमः) (सिद्धाश्रमे अवस्थितः मठ:) के एक मूर्धन्य मनीषि एवं रहस्यवादी गृहस्थ योगी ने अपनी अनन्य योग भक्ति तथा प्राणायाम के सघन अभ्यास से इस दुष्प्राप्य क्रिया को पुनः प्राप्त किया।

इस पुस्तक की रचना का आधार अन्तःपुर में 'निरालम्बोपनिषद्' के गूढ़ अर्थों एवं अलौकिक अनुभूतियों का रहस्योद्घाटन है। इस पारलौकिक स्पंदन को लेखनी में समाहित करना अति दुष्कर होता अगर ये कार्य सिद्ध साधन निर्देशित न होता। अनिर्वचनीय, अलौकिक एवं अद्भुत आनंद से परिपूर्ण इस साधना यात्रा में मूल क्रिया साख्य भाव दर्शित तथा सम्पूर्ण समर्पण के आभिर्भावभूत लक्षित हुई। इसी विशिष्ट अवस्था की समग्रता का समावेश इस रचना में लेखनीवश समाहित है।

कालांतर में साधक को ये सत्य विदित होता है कि यह एक सार्वभौम क्रिया है एवं इसका प्रत्येक 'शब्द' अक्षुण्ण, पारलौकिक एवं अक्षय है जिसका प्रादुर्भाव सामान्यतः अगोचर है। ये सर्वदा गुंजायमान है एवं सिद्धों द्वारा इनके अनवरत तथा अद्भुत कालातीत जप का श्रवण साधक को उपयुक्त काल में होता है।